Ghar ki Kahani

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घर

प्रस्तुत कहानी में लेखक शहर में स्थायी होने से गाँव के घर को बेच देने का विचार करते है। वह मिट्टी का घर उनके परिवार ने बड़ी महेनत से बनाया था। घर बेचने से पहले सब भाई एक बार इस घर में साथ रहने जाते हैं। लेखक की माँ पुरानी घटनाओं को याद करके रोने लगती है। अंत में घर न बेचने का निर्णय लेते है। घर केवल चार दीवार और छप्परवाला ही नहीं लेकिन भावनाओं का प्रतीक होता है। 

गाँव से शहर में स्थायी होने के बाद लगभग बंद रहनेवाले अपने छोटे-से गाँव के पुश्तैनी घर को बेच देने का विचार आया। जिस मुहल्ले में हमारा घर है वहाँ के पुराने पड़ोसी तो अब शहर में रहने लगे थे। अधिकतर लोगों ने तो अपने पुराने घर बेच भी दिए थे। इसलिए शादी-मृत्यु जैसे अवसर पर किसी सामाजिक रिवाज के लिए या लम्बी छुट्टियों में गाँव के इस घर में रहने जाते तो बड़ा बेढंगा लगता। नए पड़ोसी आ गए हैं और उनसे अभी नाता ही नहीं बँध पाया है। वे हमें भी आगन्तुक ही मानते थे। इसलिए उस घर को रखने का कोई आकर्षण नहीं था।
बंद रहने के कारण पुराना घर और जर्जरित होता जा रहा था। चौमासे में अधिक बरसात पड़ने पर टीन के छप्पर से भी पानी अंदर आता था जिससे घर की एक मुख्य दीवार में दरार पड़ गई थी। खुले दालान एवं आँगन में कूड़े के ढेर लग जाते। इसलिए बूढ़ी माँ की अनुमति लेकर घर बेच देने का विचार पक्का कर लिया। योग्य ग्राहक मिले तो एक गाँव में रहनेवाले व्यवहार-कुशल मित्र से बेचने की सिफारिश करके हम शहर चले आए. फिर एक दिन ‘ऑफर’ आया भी सही। ऑफर ठीक था और करनेवाला व्यक्ति अच्छा और भरोसेमंद था, इसलिए अब देर करने या आना-कानी करने का प्रश्न ही नहीं था। 
परन्तु उसी क्षण से मन में टीस-सी उठी। बार-बार मन को व्यग्र बनाता, विचार आने लगा कि पुश्तैनी घर क्यों बेचा जाए? तीन-चार पीढ़ियों से चले आते मिट्टी के कमरे के स्थान पर मेरे पिता ने यह ईंट का पक्का घर बनवाया था। कहना चाहिए कि घर के सभी सदस्यों ने स्वयं मजूरी करके घर बनाया था। पिताजी इसके लिए अपनी बैलगाड़ी में ईंटें लाए थे। चिनाई के लिए गारा बनाने के लिए गाँव के ‘आँबा तालाब’ की चिकनी मिट्टी स्वयं खोदकर लाए थे। मेरी माँ ने शहतीर तक गारे के तसले चढ़ाए थे। फिर शहर में अपने लड़कों के जब नए मकान बनने लगे तब उनके मकान, वेतनभोगी सुपरवाइजरों की देखरेख में मजदूरों द्वारा बनते देखकर, मन में थोड़ा खुश होते हुए माँ-पिताजी अनेक बार, गाँव के घर को कैसे स्वयं मेहनत करके बनाया था, उसकी बात करते हुए भावुक हो जाते थे। 
इसी घर में ही हम सभी भाई बांधवों का जन्म हुआ था। इतना ही नहीं इसी कमरे में हमारे दाम्पत्यजीवन का आरंभ हुआ और उसी कमरे में हमारी संतानों का जन्म भी हुआ। जीवन में जो अनेक अच्छे-बुरे प्रसंग आए, यह घर उनका साक्षी है। 
घर के आँगन में कैसे खेलते थे! एक दिन उस आँगन को पार कर कँधे पर थैला लटकाकर गाँव की पाठशाला में पढ़ने गए थे। एक दिन उसी आँगन को पार कर दूर परगाँव पढ़ने गए. एक दिन उसी आँगन को पारकर शहर में जाकर बसे। इसी घर के आँगन में हमारी बहनों और भाइयों के विवाह-मंडप बँधे थे। यहीं बिरादरीवालों के साथ झगड़े और स्नेह-मिलन भी हुए थे। यहीं पड़ोसियों के साथ ऊँची आवाज़ में बोला-चाली और जाड़ों में अलाव के पास बैठकर मधुर विश्रंभ कथाएँ हुई थीं। इसी आँगन में हमारे परिवार के कुछ सदस्य–भैंस, पड़िया, बैल, बछड़े बाँध जाते थे। 
इसी घर के दालान में, मेरी दादी और फिर दादा की मृत्यु के समय, गोबर से लीपकर उस पर उन्हें सुलाकर, पूजाएँ हुई थीं और कुछ वर्ष पहले मेरे पिता को भी इसी दालान में सुलाया गया था। 
हमारे घर के दोनों ओर दूसरे घर हैं। एक घर हमारे एकदम निकट के साथी का है। वह भी बंद है। मेरा मित्र रोजी-रोटी कमाने देश के अनेक स्थलों में घूमने के बाद, पत्नी की मृत्यु होने पर अब, अहमदाबाद में रहता है। उसके बाद के मकान में काशी बुआ रहती थीं। उनकी मृत्यु को वर्षों हो गए. वर्षों तक जहाँ वे रेत घड़ी लेकर रोज सामयिक करतीं, उस दालान में अब एक तोंदवाला बारोट सोता दिखाई देता है। सामनेवाले मकान का मालिक प्रौढ़ अवस्था में परन्तु कुँवारा ही चल बसा। उसके बाद जिसने वह मकान खरीदा उसने, आँगन के लिए झगड़ा करके पड़ोसी-हक स्थापित किया। एक दिन वह घर भी गिर पड़ा। अब नई दिशा में नये दरवाजे के साथ बना है। 
इस तरह सब बदल चुका है। फिर भी लगता है कि हम अपना घर क्यों बेचें! पुराना है तो भी, है तो पुश्तैनी घर। वह घर है। चार दीवारों और छप्परवाला कोई मकान नहीं है। मकान पैसों से खरीदा जा सकता है, बनवाया जा सकता है, पैसे लेकर बेचा जा सकता है, परन्तु घर? घर तो एक भावना है। घर न होने पर, घर की भावना भी अच्छी है। वह घर सिर्फ़ पैसे से खरीदा या बनवाया नहीं जा सकता। इसलिए लगने लगा कि भले ही घर पुराना होता जाए, जीर्ण होता जाए, भले ही गिर पड़े, परन्तु वह बना रहे। 
दूसरी ओर, मन दूसरा तर्क करता है कि यह सब भावुकता है। यदि गाँव में जाना ही न हो तो वहाँ घर रखने का क्या अर्थ है? अच्छे पैसे मिल रहे हैं। इतने पैसे ‘फिक्स्ड डिपोजिट’ में रखें, तो भी…. 
Ghar ki Kahani
अन्त में निकाल देने का ही निर्णय लिया। परन्तु हम सब भाइयों ने, एक बार सपरिवार, अपने उस घर में कुछ दिन एक साथ रहने के लिए सोचा। हमेशा के लिए निकाल देना है तो एक बार उस घर में सब एक साथ रह लें। 
और फिर लम्बे समय के बाद वह बंद घर खुला। 
देखते-देखते छोटे-बड़े परिवारजनों से वह सूना घर गूंजने लगा। इस अवसर पर एक नगरवासी मित्र को गाँव के इस घर को देखने के लिए साथ ले गया था। पुराने दिन वापस लौट आए थे। पिताजी की मृत्यु के बाद मेरी माँ करीब-करीब उदास रहतीं। घर के सामाजिक प्रसंगों में भी विशेष रुचि नहीं लेती थी। वह भी यहाँ आकर सबके बीच प्रसन्न लगीं। 
परन्तु अब घर की प्रत्येक दीवार मुझे उलाहना देने लगी। दालान में जहाँ मैं हमेशा बैठता; जहाँ बैठकर पहली बार ककहरा लिखा; और जहाँ बैठकर छुट्टियों में उच्च शिक्षा के ग्रंथ पढ़ता था, वहाँ जाकर बैठा। वहाँ भीत से टेक लेते ही वह अन्दर से मुझे हिला गई. मैंने पीछे मुड़कर उस पर हाथ फेरा। वह कह रही थी-‘एक तो इतने दिन बाद आए और अब बस हमेशा के लिए….’ 
मैं व्यग्र हो गया। आँगन में खाट बिछाकर बैठ गया। अब वहाँ खाली नाद थी। खूट थे। परन्तु ढोर डंगर नहीं थे। परन्तु, उस ओर देखते ही मानो वे सब एक साथ रंभाने लगे। मैं एकदम खड़ा हो गया। शून्य आँखों में भरा हुआ आँगन देखता रहा…. घर की यह खपरैल। कितने सारे चौमासों में इसका संगीत सुना है! यहाँ तोरण के बीच नीचे मेरी बहनें विवाह-मंडप में बैठी थीं और यहीं दादी, दादा और पिताजी की अर्थियाँ बँधी थीं। ऐसा लगा जैसे मेरा गला रुंध गया हो। 
घर के अन्दर के कमरे में गया। बंद जर्जरित कमरा, अधिक मुखर लगा। पिछली दीवार की एक जाली से थोड़ा प्रकाश आ रहा था। एक समय यह कमरा अनाज भरने की मिट्टी की कोठियों और पिटारों से भरा रहता था। वह सब तो कब का निकाल दिया है। परन्तु अभी भी कोने में दही बिलोने का बड़ा मटका और खूटी पर बड़ी रई लटकी है। मैं यहाँ जन्मा था; मेरी संतानें भी… अब
बीच के खंड में, जहाँ हम खाना खाते थे, वहाँ से होकर फिर दालान में आता हूँ। माँ अकेली बैठी हैं। सब इस समय इधर-उधर हैं। देखता हूँ कि बूढ़ी माँ रो रही हैं। माँ को कम दिखाई देता है, कम सुनाई देता है। अब अधिक दिन निकाल सकें, ऐसा भी नहीं लगता। मैंने पास जाकर पूछा-‘यह क्या, तू रो रही है माँ ?’ 
और वह जोर से रो पड़ी-‘यह घर…’ बस इतना ही वह आँसू और हिचकियों के बीच बोल पाईं। पिताजी के अवसान के समय नहीं रोई थीं, उतना माँ इस समय रो रही थीं। धीरे-धीरे हिचकियों के बीच उसने कहा यह घर, मैं जी रही हूँ तब तक मत निकालो। मैं अब कुछ दिनों की ही मेहमान हूँ। फिर तुम लोग जो चाहो… ‘
‘ परन्तु, माँ, तूने ही तो कहा था ! ‘
‘ कहा होगा, परन्तु वापस यहाँ आने के बाद…. नहीं, इसे तुम मत बेंचो। ‘उसका रोना बंद नहीं हो रहा था। माँ को रोता देखकर मुझे दुःख तो हुआ परन्तु आनंद विशेष हुआ। लगा कि उसका हृदय अभी जीवन्त है। उसे अभी जगत में, जीवन में रुचि है। हम तो मान बैठे थे कि अब तो माँ बस दिन गिन रही हैं। परन्तु, घर के प्रति उसका यह गहरा राग….  
घर निकाल देने की बात को लेकर मेरे मन में भी अन्दर-ही-अन्दर अपराध-बोध तो था। परन्तु अब तो एक प्रकार की तीव्र कसक उठी। घर को सभी की सहमति से बेचने का निर्णय लिया था। इकरारनामा भी हो चुका था। लेकिन उस दिन से प्रत्येक सदस्य घर की बात निकलते ही मौन हो जाता था।
इतने में छोटा भाई मकान खरीदनेवाले के साथ आया। घर के अन्य सदस्य भी एकत्र होकर माँ के आस पास बैठ गए थे। माँ को समझाने का प्रयत्न करने लगे।’ हम अधिक सुविधावाला नया मकान इस गाँव में ही बनाएँगे। इसी घर के पैसों से, तुम कहोगी वैसा ही….’
माँ ने कहा-‘मैंने इस घर की शहतीर तक, इँटे चढ़ाई हैं। तुम्हारे पिता ने कितनी उमंगों से बाँधा है। इसलिए, मेरे जाने के बाद भगवान करे कि तुम लोग महल बनवाओ…  परन्तु यह घर तो…’। छोटा भाई समय की नज़ाकत समझ गया। उसने मकान खरीदनेवाले से कहा-भाई, कुछ समय रुक जाओ. यह घर देंगे तब, तुमको ही देंगे। ” मैंने देखा कि हम सबकी छाती पर से एक पत्थर-सा हट गया था। बरसात के बाद खुले आकाश जैसा माँ का मुँह देखकर मानो जर्जरित घर हँस रहा था। अदृष्ट गृहदेवता की प्रसन्नता का स्पर्श सभी को हुआ था। 
 
Note: इस वार्ता(story) को किस लेखक(author) ने लिखा है वो में जनता नही हु, अगर आप कोई जानते हो तो Comment Box में जरूर लिखे।

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