पहली चूक: Moral Stories in Hindi for Class 10

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Moral Stories in Hindi for Class 10: प्रस्तुत कहानी ‘पहली चूक‘ में लेखक ने एसे लोगों पर व्यंग्य किया हैं जो शहर में रहते हैं और गाँव के वातावरण से बिलकुल अपरिचित होते है। वे पुस्तकों और सिनेमा से प्राप्त जानकारी के आधार पर मन में कल्पना का गाँव बनाते हैं। पर गाँव के यथार्थ जीवन से सामना होने पर उनका कल्पना का गाँव टूट जाता है। 

उत्तम खेती, मध्यम बान,
अधम चाकरी, भीख निदान। 

पहली चूक

यह कहावत पहले मैं कई बार सुन चुका था। अब हुआ यह कि बी. ए. पास करने के बाद मुझे अधम चाकरी मिली ही नहीं। इसलिए उसे भीख निदान समझकर मैंने खेती के उत्तम व्यवसाय में हाथ लगाना चाहा और अपने गाँव चला आया। 
मेरे चाचा ने मुझे समझाया कि खेती का काम है तो बड़ा उत्तम, पर फारसी पढ़कर जिस प्रकार तेल नहीं बेचा जा सकता वैसे ही अंग्रेज़ी पढ़कर खेत नहीं जोता जा सकता। इस पर मैंने उन्हें बताया कि यह सब कुदरत का खेल है क्योंकि फारस में तेल बेचने वाले संस्कृत नहीं बोलते, खेत जोतते हैं। 
चचा बोले, “बेटा यह खेती का पेशा तुमसे नहीं चलेगा। यह तो हम जैसे जाहिलों के लिए है। इसमें तो दिन-रात पानी और पसीना, मिट्टी और गोबर से खेलना पड़ता है।”
इस पर मैंने जवाब दिया कि यह शरीर ही मिट्टी का बना हुआ है और यह गोबर तो परम पवित्र वस्तु हैं। मिट्टी का स्थान यदि पंचभूत में हैं तो गोबर का स्थान पंचगव्य में है। 
मेरे मुँह से पवित्रता की बात सुनते ही चचा दंग रह गए. आस-पास बैठे हुए लोगों में “धन्य है” का नारी लग गया। तब मैंने फिर कहना शुरू किया, “और चचा, यह खेती जाहिलों का पेशा नहीं है। बड़ों-बड़ों ने इसकी प्रशंसा की है। कार्लाइल ने इस पर लेख लिखे हैं, टॉलस्टाय तो स्वयं किसान ही हो गया था, बाल्टेयर खुद बागवानी करता था, ग्लैड्स्टन लकड़ी चीरता था। अपने देश में भी गौतम जैसे ऋषि गेहूँ बोते थे। वैस तो, कंद-मूल-फल खाने के कारण उनकी दिलचस्पी हॉर्टिकल्चर में थी और, वे ज्यादातर फल और शकरकंद ही पैदा करते थे, इसलिए खेती को उत्तम मानना ही चाहिए. मैं कल से खेती करूँगा। मेरा यही फैसला है।” 
मेरे चाचा मेरी बात से प्रभावित तो हुए पर बोले “बेटा, खेती करोगे पर इतना समझ लो कि खेतों के आस-पास न तो कॉफी हाउस होते हैं न क्लब। सिनेमाघरों की गद्देदार कुर्सियों की जगह अरहर की, ठियों पर घूमना-फिरना होता है।” (Moral Stories in Hindi for Class 10)
यहाँ मैं आपको बता दूं कि मुझे सिनेमा का बड़ा शौक है। यह इसलिए कि सिनेमा खेती की उन्नति का एक अच्छा साधन है। सिनेमा द्वारा खेती का बड़ा प्रचार हुआ है। बड़े-बड़े हीरो खेत जोतने जाते हैं और गाते जाते हैं। हीरोइन खेत पर टोकरी में रोटी लेकर आती है। हरी-भरी फ़सल में आँखमिचौनी का खेल होता है। फ़सल काटते समय हीरोइन के साथ बहुत—सी लड़कियाँ नाचती हैं और गाती भी हैं। वे नाचती जाती हैं और फ़सल अपने-आप कटती जाती है। ऐसे ही मधुर दृश्यों को देखकर पढ़े-लिखे आदमी गाँवों में आने लगते हैं और खेतों के चककर काटने लगते हैं। इस प्रकार सिनेमा द्वारा खेती की शिक्षा मिलती है। सच पूछिए तो खेती करने की सच्ची शिक्षा मुझे भई सिनेमा से ही मिली थी। 
दूसरे दिन चचा ने मुझसे खेतों पर जाकर काम करने के लिए कहा। मैंने पूछा, “खेत कहाँ पर हैं।” 
उन्होंने कहा, “गाँव के दक्खिन की ओर, रमेसर की बाग के आगे से गलियारा जाता है। गलियारे से पश्चिम एक राह फूटतो हैं। राह से उत्तर एक मेंड़ जाती है। मेंड के पूरब गन्ने का एक खेत है। गन्ने के खेत के पास बाजरा खड़ा है। वहीं अपने खेत जोते जा रहें हैं। तुम जाकर काम देखो।” 
मैं चल पड़ा। कुवार का महीना था। आसमान पर हल्के-हल्के बादल थे। ताड़ और खजूर के पेड़ हिल-हिलकर एक-दूसरे के गले मिल रहे थे। सब कुछ सिनेमा-जैसा लग रहा था। तभी आगे एक कुआँ दीख पड़ा। सिनेमा में हीरोइन कुएँ पर पानी भरती है और हीरो खेत की ओर जाते हुए उससे बातें करता है। मैंने रुककर सीटी बजाई पर कुआँ सुनसान था। किसी के पायल नहीँ झनके, न कोई घडा फूटा। इसी तरह पूरा रास्ता कट गया। न खेतों में आँखमिचौनी का दृश्य दीख पड़ा, न हीरो ने कोरस गाए. मुझे देहात से बड़ी निराशा हुई।  चुपचाप अपने रास्ते पर चलता गया। 
Moral Stories in Hindi for Class 10
अब मैं ऐसी जगह पहुँचा जहाँ मेरे खेत होने चाहिए थे। चाचा ने बताया था कि वहीं गन्ने का खेत है और वहीं बाजरा खड़ा है। मैं गन्ने के बारे में ज़्यादा नहीं जानता था। इसलिए बाजरे का सहारा लेना पड़ा। एक मेंड़ पर एक अधेड़ किसान खड़ा हुआ था। उसके पास जाकर अपना गाना बन्द करते हुए मैंने पूछा, “आपका नाम बाजरा तो नहीं है?” 
किसान ने मेरी ओर घूरकर देखा, फिर घबराहट के साथ पूछा “यह आप पूछ क्या रहे हैं? मेरा नाम तो रामचरन है।” 
मैंने रामचरन के कन्धे पर हाथ रखकर सार्वभौमिक मित्रता के भाव से कहा, “तो भाई रामचरन, मुझे बताओं ओह बाजरा कौन है?” मेरी बात सुनते ही रामचरन ज़ोर से हँसने लगा। आस पास काम करते हुए किसानों को पुकारकर उसने कहा, “यह देखो, ये भैया तो बाजरा को आदमी समझ रहे हैं।” दो-तीन किसान हँसते हुए वहीं आ गए. मैं समझ गया कि मुझसे चूक हो गई. इसलिए बात पलटते हए मैंने कहा, “ओ, मैं तो हँसी कर रहा था दरअसल मैं तो बाजरे के पेड़ की छाँह ढूँढ़ रहा हूँ। उसी पेड़ के पास मेरे चचा के खेत हैं।” 
इस बार वे किसान कुछ और ज़ोर से हँसे। मुझे भई झेंप—सी लगी। पर मैंने हँसकर इस बात को टाल दिया।
दूसरे दिन से ही मुझे इस बात की चिन्ता हुई कि ऐसी चूक मुझसे कहीं दुबारा न हो जाए. इसलिए कृषि-शास्त्र की मोटी-मोटी किताबें मँगवाकर मैंने, उनका अध्ययन आरम्भ कर दिया। गाँव से मैं हताश हो गया था। वहाँ वह था ही नहीं जो मैंने रुपहले पर्दे पर देखा था। फिर भी मैं अध्ययन करता रहा। अध्ययन करते-करते मैं इस नतीजे पर पहुँचा कि आदर्श खेती गाँव में हो ही नहीं सकती, वह शहर में ही होती है। यह सब इस प्रकार से हुआ। 
मुझे बीज और खाद खरीदन के लिए बीजगोदाम जाना पड़ा। बीज गोदाम के कर्मचारी शहर गए हुए थे। इसलिए मैं भी शहर चला गया। दूसरे दिन मुझे अपने खेतों में अच्छे हलों से जोताई करानी थी। अच्छे हल शहर में मिलते हैं। इसलिए मैं फिर शहर पहुँचा। तीसरे दिन मुझे नहर में एक नया पाइप लगवाने की ज़रूरत आने पड़ी। उसके लिए नहर के बड़े इन्जीनियर का हुक्म लेना पड़ता है। वे शहर में रहते हैं। इसलिए मैं फिर शहर गया। चौथे दिन कुछ कीटाणुनाशक दवाइयाँ खरीदने के लिए मुझे शहर का चक्कर लगाना पड़ा। फिर मुझे कृषि विभाग के एक कर्मचारी की शिकायत करने के लिए शहर जाना पड़ा। उसके बाद मैं जितना ही खेती की समस्याओं को समझता गया उतना ही शहर जाने की आवश्यकता बढ़ती गई. इसलिए एक दिन मैंने कृषि-शास्त्र की सब किताबें एक बैग में बंद की और अपनी कार्डराय की पतलून और रंग-बिरंगी छापेदार बुश शर्ट पहनी, बेल्ट, कैप लगाई और, चचा से कहा, ” देखिए, यह खेती का काम ऐसा है कि बिना शहर गए उसे साधना कठिन है। इसलिए मैं शहर जा रहा हूँ। वही रहूँगा और वहाँ से वैज्ञानिक ढंग की खेती करूँगा।”
चचा ने प्रसन्नता पूर्वक हँसकर कहा,” जैसे खूट से छुटी हुई घोड़ी भूसे के ढेर पर मुँह मारती है, जैसे धूप में बँधी हुई भैंस तालाब की ओर दौड़ती हैं, वैसे ही तुम्हारा शहर की ओर जाना बड़ा स्वाभाविक और उचित हैं। मैं आदमी पहचानने में कभी चूक नहीं करता, पर तुम्हें पहचानने में ही मुझसे पहली चूक हुई. जाओ, शहर ही में रहकर खेती करो।” 
मैंने भी प्रसन्न मुद्रा में कहा,” नहीं चचा। चूक आपसे नहीं हुई, पहली चूक तो मुझी से हुई थी जो मैंने बाजरे को पहले आदमी समझा और बाद में उसे छायादार पेड समझता रहा। पर कोई बात नहीं। अब मैं शहर में रहकर बाजरे के विषय में आ और बताऊँगा कि किस खाद के प्रयोग से बाजरे की लताओं में मीठे और बड़े-बड़े फल लाए जा सकते हैं।” 
इस प्रकार हम दोनों ने प्रसन्नतापूर्वक एक-दूसरे से विदा ली। मैं सीटी बजाता हुआ स्टेशन की ओर चल दिया और वे बैलों की पूँछ उमेठते हुए खेत की ओर चले गए।  
 
Note: इस वार्ता(story) को किस लेखक(author) ने लिखा है वो में जनता नही हु, अगर आप कोई जानते हो तो Comment Box में जरूर लिखे।
मित्रो, मै आशा करता हु की आपको हमारी यह पहली चूक की कहानी और Moral Stories in Hindi for Class 10 पोस्ट पसंद आयी होगी। ऐसी ही मजेदार कहानिया पढ़ने के लिए हमारी वेबसाइट www.jaduikahaniya.com की मुलाकात लेते रहिए। 

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