गुरु पर्व

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गुरु पर्व 

भारत की धरती पर बड़े – बड़े संत , फ़कीर और ज्ञानी हुए हैं । इन विशाल सूफी – संतों में गुरु नानक देव का नाम बहुत महत्वपूर्ण हैं । वह लाहौर से कुछ दूर तलिौडी नाम के गांव में 1429 ई . , में पैदा हुए थे । यह स्थान अब पाकिस्तान में हैं और ननकाना साहब के नाम से जाना जाता हैं । 

नानक जी बचपन ही से बहुत बुध्धिमान और धार्मिक विचार के थे । उनकी धार्मिक श्रद्धा देख कर उन को शिक्षा देने वाले मौलवी और पंडित भी दंग रह गए । यूं तो देखने में नानक देव का दिल पढ़ाई लिखाई में नहीं लगता था लेकिन गहरी सोच रखने के कारण वह संस्कृत और अरबी , फारसी के बड़े विद्वान बन गए । 
गांव के दूसरे बच्चों की तरह उन को भी बचपन में मवेशी चराने की जिम्मेदारी दी गई । लेकिन वह गाय – भैंसों को जंगल में छोड़ देते थे और स्वयं परमात्मा की भक्ति में डूब जाते थे । जवान होने पर नानक देव के पिता ने उन को कुछ पैसे व्यवसाय के लिए दिए । लेकिन उन्होंने सारे पैसे साधू संतों की सेवा में खर्च कर दिए और खाली हाथ घर वापस आ गए । अठारह साल की आय में नवाब दौलत खां के यहां उनको नौकरी मिल गई । वहां भी नानक जडी गरीबों की सेवा में लगे रहे , एक दिन तेरह सेर आटा तौलते समय तेरा – तेरा कहते गए और सारा आटा एक गरीब को दे दिया । परिणामस्वरूप नौकरी से हटा दिए गए । 
उसी साल उनकी शादी सुलक्षणा देवी से हुई । आप के बेटे लक्ष्मी दास और श्री चन्द पैदा हए । लेकिन दुनियादारी से जी ऊब गया था , इसलिए तीस वर्ष की आयु में बैराग ले लिया । आप ने देश भर में घूम – घूम कर नान पंथ का प्रचार किया । गुरु नानक हिंदू समाज की जात के बंटवारे और सतीप्रथा के खिलाफ थे। आप निराकार ईश्वर के भक्त थे और मेहनत से रोजी कमाने का पाठ देते थे। एक बार एक धनवान आदमी का निमंत्रण छोड़ कर उन्होंने एक बढ़ई के घर की रूखी-सूखी रोटी खाई. जब धनवान ने शिकायत की तो नानक जी ने दोनों की रोटियों को निचोड़ कर दिखाया। गरीब की रोटी में से दूध और रईस आदमी की रोटी में से खून की बूंदे टपकी। यह देख कर दौलतचंद आदमी बहुत शरमाया, क्योंकि उसने धन गरीबों का खून चूस कर प्राप्त किया था। 
कहा जाता हैं कि गुरु नानक जी मक्का और बग़दाद भी गए जहाँ खलीफा ने उनका जोरदार स्वागत किया। फिर वह ईरान होते हुए बुखारा पहुंचे। देश लौटकर वह गुरुदासपुर जिला के गांव कर्तारपुर में बस गए. 1539 ई । को आप अपने ईश्वर से जा मिले। आप को मानने वाले सिक्ख कहलाते हैं। 
हर कार्तिक पूर्णिमा को अक्टूबर-नवंबर के महीने में गुरु नानक जी का जन्म दिवस सिक्ख लोग गुरूपर्व के रूप में मनाते हैं। गुरु नानक का कहना था कि सारे मनुष्य बराबर हैं वह सिक्ख धर्म के आदि गुरु हैं। उनके कथन, वचन गुरुग्रंथ साहब में इकट्ठा किए गए हैं जो सिक्खों की पवित्र पुस्तक हैं। गुरूपर्व को गुरुद्वारों को खूब सजाया जाता हैं। उनके भक्त गुरुबाणी गीत के रूप में गाते हैं। इस दिन प्रभात फेरियाँ निकाली जाती हैं। शाम को बहुत बड़ा जुलूस निकाला जाता हैं। 
जिसके रास्ते में जगह-जगह शर्बत, फल और खाने के सामान बांटे जाते हैं। सारे रास्ते गुरुग्रंथ साहब का पाठ होता रहता हैं। रास्ते में लंगर लगते हैं। जहाँ कड़ा प्रसाद बांटा जाता हैं। गुरु गोविंद सिंह सिक्खों के दसवें और अंतिम गुरु थे। उनके बाद ‘खालसा पंथ’ गुरु ग्रंथसाहब की निगरानी में चलता हैं। गुरुग्रंथ साहब, गुरु अर्जुन देव के “आदि ग्रंथ” से कुछ भिन्न हैं। इसमें गुरु नानक, संत कबीर और दूसरे सूफियों की अच्छी-अच्छी बातें शामिल हैं। गुरु गोविंदजी का जन्म दिवस भी गुरु पर्व कहलाता हैं। जो पूस अर्थात् दिसम्बर-जनवरी में आता है। यह भी गुरुनानक के जन्मदिक की तरह मनाया जाता है। इस दिन सिक्ख धर्म के अनुयायो घरों में दीवाली की तरह रोशनिया करते हैं और बच्चे पटाखे, फुलझड़िया छोड़ते हैं। गुरु गोविन्द सिंह का जन्म पटना में हुआ था, इस दिन गुरुद्वारा पटना साहब में दर्शन करने वालों की भीड़ होती हैं। इस दिन गुरुग्रंथ साहब का जुलूस निकाला जाता हैं, जिसके आगे-आगे पांच प्यारे चलते हैं। इसके अतिरिक्त गुरु पर्व पर अखंड पाठ होता हैं।
 
 Note: इस वार्ता(story) को किस लेखक(author) ने लिखा है वो में जनता नही हु, अगर आप कोई जानते हो तो Comment Box में जरूर लिखे।
 

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